आब कम्प्यूटर आ मोबाइल पर मिथिलाक्षर (तिरहुता) मे लिखबाक सुविधा भए जाएत।


Bhavanath Jha जी

भारत सरकारक संस्था Center for Development of Advance Computing (C-DAC) के पुणे शाखा एकरा विकसित कए रहल अछि। एहिसँ पहिने ओकर Unicode स्वरूप निर्धारित भए चुकल छल, मुदा नहिं जानि, केना मिथिलाक्षरक रूप कें बंगलाक अति समीप बनाए देल  गेल। फलतः ओकर संशोधनक आवश्यकता भेलैक । एहि कार्यक लेल हमरा बजाओल गेल छल। 

ओतए हम मिथिलाक्षरक शिलालेख आ प्राचीन सँ लए नवीन पाण्डुलिपि सभक मिथिलाक्षरक आधार पर ओकर संशोधन कएल। हमरा लग नान्यदेवक शिलालेख, दरभंगाक 1431 ई.क स्तम्भलेख, आसी गामक गरुडध्वज स्तम्भलेख, पक्षधरक लिखल विष्णुपुराणक पाण्डुलिपि, छत्रसिंहक कालक दुर्गामन्दिर अभिलेख, पं. भवनाथ मिश्रक दुर्गासप्तशतीक पाण्डुलिपि आ 19म शतीक अन्य 10 गोट विभिन्न व्यक्तिक हस्तलेख छल। एहि सभटा में मिथिलाक्षरक विभिन्न स्वरूप कें देखैत ओकर अधिकतम व्यवहारकें ध्यानमे रखैत मिथिलाक्षरक स्वरूपक निर्धारण हम कएलहुँ।राजेश्वर झाक पुस्तक “मिथिलाक्षरक उद्भव एवं विकास” आ सूर्यनारायण झा सत्यार्थीक “मिथिलाक्षरक का उद्भव एवं विकास” पुस्तकक उपयोग कएल गेल अछि। एही क्रममे श्री आशीष झाक द्वारा पठाओल छत्रसिंहक कालक दुर्गामन्दिर शिलालेख बड़ उपयोगी सिद्ध भेल। 

एहि क्रममे स्पष्ट भेल जे मिथिलाक्षरक विविध प्रकारमेसँ एकटा रूप आइ बंगला मे प्रचलित अछि। संगहिं बंगलापर संयुक्ताक्षरक लेखनमे देवनागरीक शैलीक प्रभाव सेहो पडल अछि। तें बंगलाक अक्षर सँ दूरी रखैत मिथिलाक्षरक अपन परम्पराक अनुसार एकर निर्धारण कएल। एहिमे ह्रस्व एकार जेना (मॆऽ, गॆऽ, दॆऽ, धॆऽ आदिक लेल सेहो व्यवस्था कराओल। देवनागरीमे पहिनहिंसँ अछि, मुदा मिथिलाक्षरमे नहिं छल। ऊपध्मानीय आ जिह्वामूलीयक लेल चिह्नक प्रस्ताव देल, जे स्वीकार कएल गेल। संगहिं वैदिक संकेत सभ जे यूनीकोड मे अछि ओहो सभटा सुविधा मिथिलाक्षरमे जोडि देल जेतैक।

किछु संयुक्ताक्षर मे देखल गेल जे संयोगक प्रक्रिया एके रंग अछि, दूनू वर्ण स्पष्ट रूपसँ छैक मुदा लिखबाक क्रममे हाथक दिशा बदलि गेलाक कारणें किछु संयुक्ताक्षर अपन स्वरूपसँ बदलि अधिक अस्तव्यस्त भए गेल अछि। एहन स्थानमे किछु सरलीकरण कएल गेल अछि। किछु मूल अक्षर सेहो बदलए पडल, जाहि परिवर्तनमे जे स्वरूप लेल ओकर सिद्धान्त एहि प्रकारें रहल जे नीचाँ चित्र मे देल अछि।

Font बनौनिहार लोकनिक सहयोगात्मक समर्थन रहल। ओ लोकनि चाहैत छथि जे ई मिथिलाक्षर अपन पारम्परिक स्वरूपमे सोझाँ आबए।

साभार : Bhavanath Jha जी

0 टिप्पणियाँ Blogger 0 Facebook

 
Apanmithilaa.com © 2016.All Rights Reserved.

Founder: Ashok Kumar Sahani

Top