.............. धिया............


✍👤 मोहन भारद्वाज

धिया नहि परहतै,
घर'क राज-काज करतै।
बाबु साहब गुल्ली-डंडा खेलैतै,
आ धिया नेना खेलैतै।।
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धिया चुल्हा फुंकतै,
बाबु गुटका थुकतै।
धिया कान छैदेतै,
बाबु पान चबेतै।।
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बाबु'क जन्मैते,
लड्डु बटेतै,
माछ कटेतै,
टोल'क टोल नोतेतै।
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वैह धिया'क जन्मैते,
बाप'क दांत कोतेतै,
बाबा माथ दबेतै,
आ दाय दैव कोसतै।।
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इ कत'क न्याय छै,
हे मैथिल जन ,
अहीं कहु ,
इ कत'क न्याय छै???
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 जे बाबु'क वास्ते,
१४ बरख में कालेज तकेतै।
वैह धिया'क वास्ते,
बारहे बरख सँ दुल्हा तकेतै।।
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बचपने में बियाहल जाइत छै,
साउस द्वारा प्रतारल जाइत छै।
मटिया तेल ढारल जाइत छै,
आब त' धिया पेटे में मारल जाइत छै।।
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इ कत'क न्याय छै,
धिया'क संगे ,
इ त' न्याय नहि,
घोर अन्याय छै।
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कहबी मानी त'
धिया घर'क लक्ष्मी छै।
मुदा विन सरस्वती'क त'
कोन कर्म'क लक्ष्मी छै??
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अपन लक्ष्मी के सरस्वती सँ मिलाबु,
पूरा परिवार के शिक्षित बनाबु।
अशिक्षा के दुर भगाबु,
मिथिला के नाम आगु बरहाबु।।
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धिये त' किनको माय छै,
किनको दाय छै।
किनको कनिया छै,
किनको बहिनिया छै।।
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हे मैथिल जन,
हिनकर मान बरहाउ,
सम्मान दिलाउ।
धिया बचाउ,
धिया परहाउ।।
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जय मिथिला
जय मैथिली।
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✍👤mohan bhardwaj
      

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