गरिबक चुल्हि पजारि क' देखियौ
छबि - नेपालके बाढ़ि में घर टुटल एक पीड़ित के अछि

✍👤 रंजीत कुमार झा
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बड जे बाजथि छी हम संगे!
दुःख में कने हकारि कऽ देखियौ!!

रुकि-रुकि चलै कलमक स्याही!
कुर्ता पर कने झारि कऽ देखियौ!!

बुझब हमहुँ मोछबला छी!
कनियाँ के ललकारि कऽ देखियौ!!

भतबरी हएत मित कुटुम सँ!
एकबेर कर्जा धारि क' देखियौ!!

कहु कोना ई न'ह खियैल!
बासन माजि अखारि क' देखियौ!!

घर- घरारी कियै बेचलियै?
नित उठि बोतल ढारि क' देखियौ!!

अहुँ के कनियाँ खुब मानती!
रोजे डाँर ससारि क' देखियौ!!

मोन में सबहक बास करब यौ!
आनक भार उतारि क' देखियौ!!

केहन लगै छै पुलिसक आदर!
जिबिते दाँत उखारि क' देखियौ!!

कर्मक बलें सच होएत सपना!
जन्त्र मन्त्र उजारि क' देखियौ!!

ने रहब उपासल कहियो आहाँ!
गरिबक चुल्हि पजारि क' देखियौ!

गप्पक बड छोरलहुँ गोली बम!
किछु त' काज स्महारि क' देखियौ!!

अपना घर पर सुथनी खेएब!
एक त' मैथिल तइ पर भोज!
रसगुल्ला के गाड़ि क' देखियै!!

यौ सदिखन हमरा मुँहे दुसलहूँ!
एक बेर थपरी मारि कऽ देखियौ!!

✍👤रंजीत कुमार झा


कबि - रंजीत कुमार झा जी

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