मिथिला में हरितालिका पूजा

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दिनभरि निराहार रहि मैथिल स्त्री साँझखन पवित्र भय खूब सुनर केरा केर थम्ह सौं मण्डप सजा ओहि में मंगलाचरण पूर्वक शिव पार्वतीक प्रतिमा स्थापित कय सुगंधित पुष्प धूप दीप ताम्बूल अक्षत चानन वस्त्र नाना प्रकारक नैवेद्य नारियल सुपारी लौंग अनार नारंगी जमीरी नेबो आ सामयिक फल फूल सौं शिव-पार्वतीक पंचोपचार पूजा करैत ई कामना करै छथि-हे शिवे! शिवरूपिणी! हे मङले! सर्व अर्थ केर देनिहारि! हे देवी! शिवरूपे आहाँक सर्वदाक लेल नमन।आहाँ के नमस्कार अछि हे जगध्दात्री! हे सिंहवासिनी! संसारक भय सौं रक्षा कयनिहारि हमर रक्षा करू। एहि तरहे पूजा कय कथा श्रवण कय आरती करै छथि आ ब्राह्मण के वस्त्र गाय सुवर्ण जिनका जतेक श्रद्धा विभव ओतेक दान दक्षिणा करै छथि आ राति भरि शिव-पार्वतीक ध्यान करैत जागरण करैत छथि। 
          एहि तरहे स्त्री पुरूषक संग जे पूजा करै छथि सब पाप सौं मुक्त भय सात जन्म तक सुख सौभाग्य प्राप्त होईछनि।

          दोसर दिन प्रात:काल बाँसक पात्र में अन्नादि भरि ब्राह्मण के दान कय पारणा करै छथि
      महादेव कहै छथिन पार्वती सौं-जे अहि तरहे पूजा करै छथि हमरे सन पति पवै छथि हुनक सौभाग्य हमरे सन होई छनि सब तरहक सांसारिक सुख पबैत छथि।एहि व्रतक कथा मात्र सुनला सौं एक हजार अश्वमेध आ एक सौ बाजपेयी यज्ञक फल प्राप्ती करै छथि।हे पार्वती हे देवी! हम आहाँके सब व्रत सौं उत्तम व्रत कहलहुँ जाहि सौं सब पाप सौं मुक्ती भेटैत अछि। सुहाग भागक रक्षक अहि ई पूजा।
             एहि पूजा के तीज पूजा अर्थात तृतिया में करै वला पूजा सेहो कहल जाई अछि।कतेक ठाम समूह बना स्री लोकनि ई पूजा सेहो करै छथि। मिथिला में ई पूजा कतौह कतौह कयल जाई अछि।
         भादव शुक्ल तृतिया के भविष्योत्तर पुराण में कहल हरितालिका पूजा महिला समाज में प्रसिद्ध अछि।चतुर्थी सौं युक्त तृतिया में इ पूजा करक चाही।
     

साभार - संस्कार मिथिला
जय मिथिला जय मैथिल जय मैथिली


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