हरितालिका तीज व्रत पर्व महात्म्य

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हरितालिका व्रत भाद्रपद शुक्ल तृतीया तिथि में संपन्न करबाक  विधान छै।एहि दिन सौभाग्यवती स्त्री अपन अखंड सौभाग्यक   रक्षा के लेल बड़ श्रद्धा, विश्वास आ लगनक संग हरितालिका व्रत (तीज)- केर उत्सव मनबैत छथि।जाहि त्याग-तपस्या आर निष्ठाक संग स्त्री ई व्रत करैत छथि, ओ अत्यंत कठिन छैक। अहि में फलाहार-सेवनक बात त' दूर,अति दृढ निष्ठावान महिला जल तक नै ग्रहण करैत छथि। व्रत के दोसर दिन प्रातःकाल स्नानक पश्चात व्रतपारायण स्त्री सौभाग्य-द्रव्य छुबि ब्राह्मण के दैत छथि। एकरा पश्चात व्रती जल आदि ग्रहण कए अहि व्रतक पारण करैत छथि। 
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 व्रत में मुख्य रूप सँ शिव-पार्वती तथा गणेशजीक पूजन कएल जाईत छैन्ह। किम्वदंती अछि कि अहि  व्रत के सर्वप्रथम गिरिराजनन्दिनी उमा केने छलीह,जकर शुभ फल स्वरूप हुनका भगवान् शिव पति रूप में प्राप्त भेल रहथिन। एहि व्रतक दिन व्रती ओ कथा सेहो सुनैत छथि, जे पर्वती जी के जीवन में घटित भेल रहैन।ओहिमे पार्वती के त्याग, संयम, धैर्य आर एकनिष्ठ पतिव्रत-धर्म पर प्रकाश डालल गेल अछि, जकरा सुनला सँ सुनय वाली स्त्री कर मनोबल बढ़ैत छैन्ह। 
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                   हरितालिका तीज व्रत कथा
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दक्ष कन्या सती जाखन पिता के यज्ञ में अपन पति शिवजी केर अपमान नै सहन कए योगाग्रि में दग्ध भ गेली,ताहिखन ओ हिमालयराजक तपस्या के फलस्वरूप  पुत्री के रूप में पार्वती के नाम सँ पुनः प्रकट भेली।  नूतन जन्म में सेहो हुनक पूर्व जन्मक स्मृति अक्षुण्ण बनल रहलनि आर ओ निरंतर  भगवान् शिवक चरणारविन्द केर चिंतन में संलग्न रहय लगली। जखन ओ वयस्क भ' गेली त' मनोनकूल वरक प्राप्ति के लेल पिताक आज्ञा सँ तपस्या करय लगली।
=================================== पार्वती कतेक बरख धरि निराहार रहैत कठोर साधना केलनि। जखन हुनक तपस्या फलोन्मुख भेलनि, त' एक दिन देवर्षि नारदजी महाराज गिरिराज हिमवान् के ओहिठाम पधारलनि। हिमवान् एकरा अपन अहोभाग्य मानलनि आर देवर्षि नारद के बड़ श्रद्धाक संग सत्कार केलनि। कुशल-क्षेमक पश्चात् नारदजी कहलनि- विष्णु जी अपनेक कन्याक वरण करय चाहैत छथि, ओ हमरा द्वारा एतय समाद पठौलनि अछि।अतः अहि संबंध में अपनेक जे विचार हुए ओहि सँ हमरा अवगत करा देल जाऊ। 
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नारदजी स्वयं सेहो अहि प्रस्तावक अनुमोदन कए देलनि। तखन हिमवान् राजी भ' गेलाह आ अहि विवाहक स्वीकृति द देलनि। देवर्षि नारद पार्वती लग जा कहलनि -उमे ! छोड़ु ई कठोर तपस्या, अहाँ के अपन साधनाक फल भेंट गेल। अहाँक पिता भगवान विष्णुक संग अपनेक विवाह तय क' देलनि। ई कहि  नारदजी चैल गेलाह। 
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हुनकर बात पर विचार कय पार्वती जी के मन में बड़ कष्ट भेलनि। ओ मूर्छित भ' खैस पड़ली। सखी सबहक उपचार सँ होश में अयला पर ओ हुनका सब सँ अपन शिव विषयक अनुराग सूचित केलनि। तखन सख़ी सब बजलीह - अहाँक पिता अहाँ के  लेबाक लेल आबिते हेता ,अतःजल्दी चलु,  कोनो दोसर गहन वन में जा नुका जाए। 
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ओहिना भेल । दोसर वन में एकटा पहाड़क कन्दरा के भीतर पार्वती शिवलिंग बना कए उपासनापूर्वक ओहि लिंगक अर्चना आरंभ केलनि। तकराबाद ओहि व्रतक प्रभाव सँ सदाशिवक आसन डोलय लगलनि। ओ पार्वती केर समक्ष प्रकट भेलाह आ हुनका पत्नीरूप में वरण करबाक वचन दए दअंतर्धान भ' गेलाह। तत्पश्चात् अपन पुत्रीक अन्वेषण करैत हिमवान् सेहो ओहिठाम पहुंच गेलाह आ सब बात बुझलक बाद ओ पार्वतीक विवाह भगवान् शंकर के संग करा देलनि।
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अंततः ‘बरब संभु नै त रहब कुमारी।।’ पार्वती के अहि अविचल अनुरागक विजय भेलनि।पार्वती जी भाद्र शुक्ल तृतीया में आराधना केने छलीह, तैं अहि तिथि के ई व्रत कएल जाईत छैक। तहिये सँ भाद्रपद शुक्ल तीज के स्त्री अपन पतिक दीर्घायु लेल तथा कुमारी कन्या अपनमनोवांछित वरक प्राप्ति लेल हरितालिक (तीज)-  व्रत करैत आबि रहल छथि।
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आलिभिर्हरिता यस्मात् तस्मात् सा हरितालिका’ सखी सबहक द्वारा हरल गेला- अहि व्युत्पत्ति के अनुसार व्रतक नाम हरितालिका पड़ल। अहि व्रतक अनुष्ठान सँ नारी के अखंड सौभाग्यक प्राप्ति होईत छैन्ह।
=================================== एहेन मान्यता अछि कि मां पार्वती १०७ जन्म नेने छलीह कल्याणकारी भगवान शिव के पति के रूप में पएबाक लेल। अंततः मां पार्वती के कठोर तपक कारण हुनक १०८म जन्म में शिवजी पार्वतीजी कें अपन अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार केलनि। ओहि समय सँ एहेन मान्यता अछि कि अहि व्रत के  करय सँ मां पार्वती प्रसन्न भ' पती के दीर्घायु हेबाक आशीर्वाद दै छथिन।

            केना पड़ल हरितालिका तीज नाम
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हरितालिका दू टा शब्द सँ बनल छैक, हरित आ तालिका। हरित केर अर्थ भेल हरण करब आर तालिका अर्थात सखी। ई पर्व भाद्रपदक शुक्ल तृतीया के मनाओल जाईत छैक, जाहि कारण एकरा तीज कहल जाइत छैक।  व्रत के हरितालिका अही दुआरे कहल जाइत छैक, कियाकी पार्वतीक सखी हुनका हरण कए जंगल में ल गेल छलीह।
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            हरितालिका तीज व्रतकी पूजन सामग्री 
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सानल माटि वा बालू । बेलपत्र, केराक पात, धतूरक फल, आकक फूल, जनेऊ, वस्त्र आ सभप्रकारक फल आ फूल पात आदि। पार्वती मॉ के लेल सुहाग सामग्री-मेंहदी, चूड़ी, काजर, टिकुली, सिंदूर, ककबा, सोहगक सामग्री आदि। नारिकेल, कलश, अबीर, चानन, घी-तेल, कपूर, दीप,दही,चीनी,दूध,मधु व गंगाजल पंचामृतक लेल।
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        🚩:हरितालिका तीज व्रत पर्व का महत्व:🚩
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ई शिव-तथा गौरी केर आराधनाक दिन थिकै। गौरी आ शिव सुखद व सफल दांपत्य जीवन के परिभाषित करैत छथि,अतः हिनक पूजा अही अभिलाषा सँ कएल जाईत छैन कि ओ पूजन तथा व्रत करय वाली के सेहो सएह वरदान देथिन। 
आजुक दिन स्त्री के लेल श्रृंगार,उल्लास तथा भक्तिभाव सँ भरल होईत अछि।
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